स्कूल परिसर में खेलते बच्चे

स्कूल परिसर में खेलते बच्चे

मूलभूत सुविधाओं से वंचित बिहार के कुशैल गाँव का एक विधालय

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ब्यूरो (इफ्फत परवीन की रिपोर्ट)। सरकारी विधालय का नाम सुनते ही आंखो के सामने एक ऐसे परिसर की छवी बनती है जहां बच्चें तो अधिक संख्या में मिल जाते हैं लेकिन उनके विकास के लिए सभी मूलभूत सुविधाएं दूर दूर तक दिखाई नही देती। बिहार के कुशैल गांव का “उत्क्रमित मध्य विधालय” ऐसे ही विधालयों की श्रेणी में आता है। जहां बच्चों की संख्या अधिक है लेकिन सुविधाएं न के बराबार है।

मुख्य रुप से यहां किस प्रकार की समस्याएं हैं? पूछने पर छठी कक्षा के छात्र राकेश ने बताया ” हमारे यहां सिर्फ तीन टीचर है और दो तीन वर्गो के बच्चों को टीचर एक ही क्लास मे बैठाकर पढ़ाती है। इससे हमें पाठ समझनें में बहुत दिक्कत होती है। कभी बोर्ड पर किसी क्लास का कार्य लिखा होता हो तो कभी दूसरी क्लास का। कई बार तों हम गलती में दूसरी क्लास का होम वर्क लिख लेते हैं ध्यान नही रहता न”।

7 वीं मे पढ़ने वाली पिंकी कहती है “बहुत कुछ नही है यहां। लेकिन शौचालय की वजह कर सबसे ज्यादा दिक्कत होती है दीदी। कैसी दिक्कत ? पूछने पर पिंकी ने बताया “हमलोगो के स्कूल में एक ही शौचालय है जो बहुत गंदा भी रहता है। जब लड़के वहां पर रहते हैं तो हम नही जाते और हाथ धोने के लिए नल के पास कभी साबुन रहता है कभी नही”।

पांचवी कक्षा का विजय कहता है “यहां कुल 7 कमरें हैं लेकिन 3 कमरें ऐसे ही पड़े रहते हैं ।वहां कभी पढ़ाई नही होती। कभी छुपा-छुपाई खेलने के लिए जाना भी होता है तो नही जाते कमरा सब बहुत गंदा रहता है। मैम लोग साफ नही करवाती”।

सोनू के अनुसार “जब परीक्षा का समय आता है तो बहूत सारे बच्चे आने लगते हैं और गर्मी के दिन में पानी पीनें मे बहुत दिक्कत होती है। एक ही नल है वहां लाइन लग जाती है और खाना बनाने वाली भी वहीं से पानी लेती है इसलिए हमलोगो को बहुत दिक्कत होता है”।

इस संबध मे जब खाना बनाने वाली दो महिलाओ से बात हुई तो वो कहने लगी “हम तो यहीं से पानी लेंगे न। एक ही नल है तो हमलोग का करें। इतने सारे बच्चों का खाना बनाने के लिए खूब पानी चाहिए होता है तो पानी तो लेना ही पड़ेगा”।

इसी बीच स्कूल परिसर में कुछ गाय भैसों पर नजर पड़ी, तत्पश्चात वास्तविक स्थिति जानने के लिए स्कूल की अध्यापिका से बात हुई। स्कूल में बच्चों को कई प्रकार की परेशानी हो रही है, यह पूछने पर अध्यापिका कहती हैं “देखिए मुझे यहां का कार्यभार संभाले हुए ज्यादा दिन नही हुए हैं। हां यहां पर कई समस्याएं हैं लेकिन सबको व्यवस्थित करने में कुछ समय तो लगेगा। अभी सबसे बड़ी समस्या स्कूल के निजी रास्ते और बौंडरी की है। जो सुरक्षा के लिहाज से भी आवश्यक है। बच्चों की प्रत्येक समस्या से अवगत हूँ और आशा करती हूँ कि जल्द ही सभी समस्याओं का समाधान हो पाएगा”।

इसमें कोई शक नही कि बिहार सरकार हर साल करोड़ो रुपए सरकारी स्कूलों की देख रेख और शिक्षा पर खर्च करती है परंतु सरकारी स्कूलों में शिक्षा के साथ साथ अन्य सुविधाओं की स्थिति यूँ ही बरकरार रही तो बिहार को पूर्ण रुप से शिक्षित बनाने का सपना कभी पूरा नही हो पाएगा। अब समय आ गया है कि हम शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान देने के साथ ही शिक्षकों और विद्धआलय परिसर की गुणवत्ता पर भी कड़ी नजर रखें।
(चरखा फीचर्स)

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